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Hydrogen Train: स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन से होगी हरित रेल क्रांति का आगाज़
Hydrogen Train: स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन से होगी हरित रेल क्रांति का आगाज़

प्रधानमंत्री मोदी हरियाणा के जींद-दिल्ली रेलखंड से स्वच्छ ऊर्जा,आत्मनिर्भर तकनीक और विकसित भारत की तेज़ रफ्तार का करेगें शुभारम्भ

आलेख–विनोद कुमार सिंह “तकियावाला”,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार

भारतीय रेल केवल देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक परिवहन तंत्र नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक, सामाजिक और औद्योगिक प्रगति की जीवनरेखा भी है।लगभग डेढ़ शताब्दी पहले भाप के इंजनों से शुरू हुई इसकी यात्रा आज अत्याधुनिक तकनीकों के नए युग में प्रवेश कर चुकी है।वंदे भारत, अमृत भारत,समर्पित माल गलियारे,’कवच’ जैसी स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली और व्यापक विद्युतीकरण के बाद अब भारतीय रेल हाइड्रोजन फ्यूल-सेल तकनीक के साथ एक और ऐतिहासिक उपलब्धि की दहलीज पर खड़ी है। विगत दिनों दिल्ली–जींद रेलखंड पर स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन का सफल परीक्षण इस बात का संकेत है कि भारत हरित,आत्मनिर्भर और भविष्य उन्मुख रेल व्यवस्था की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है।

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार भारतीय रेल की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन का शुभारंभ अगले सप्ताह प्रस्तावित है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हरियाणा से इसे हरी झंडी दिखाकर राष्ट्र को समर्पित कर सकते हैं।यद्यपि कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा अभी शेष है, लेकिन सफल परीक्षण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय रेल हरित ऊर्जा आधारित परिवहन के नए युग में प्रवेश करने के लिए तैयार है।

यह केवल एक नई ट्रेन का शुभारंभ नहीं होगा,बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भर भारत की विकास यात्रा में एक नए अध्याय का उद्घोष भी होगा।आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन की चुनौती से जूझ रही है।परिवहन क्षेत्र को प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में माना जाता है।ऐसे समय में स्वच्छ ऊर्जा आधारित सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं,बल्कि आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकता भी बन चुकी है।

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है।इस लक्ष्य की प्राप्ति में भारतीय रेल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।यही कारण है कि रेलवे अब पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करते हुए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेज़ी से बढ़ रही है।भारतीय रेल का नेटवर्क लगभग 68,500 रूट किलोमीटर में फैला हुआ है।प्रतिदिन लगभग 2.3 करोड़ यात्री तथा 30 लाख टन से अधिक माल का परिवहन इसी नेटवर्क के माध्यम से होता है।

पिछले कुछ वर्षों में रेलवे ने अपने अधिकांश ब्रॉडगेज नेटवर्क का विद्युतीकरण कर लिया है,फिर भी अनेक ऐसे रेलखंड हैं जहाँ ओवरहेड विद्युत लाइन बिछाना आर्थिक अथवा भौगोलिक दृष्टि से व्यवहारिक नहीं है।ऐसे क्षेत्रों में हाइड्रोजन आधारित ट्रेनें डीज़ल इंजनों का स्वच्छ,टिकाऊ और प्रभावी विकल्प बन सकती हैं।

हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना के परीक्षण हरियाणा के जींद– सोनीपत रेलखंड से आरम्भ हुए थे। अब दिल्ली–जींद रेलखंड तक परीक्षण का सफल विस्तार इस तकनीक की परिपक्वता और भारतीय रेल की तैयारी का प्रमाण माना जा रहा है।

परीक्षण के दौरान इमरजेंसी ब्रेकिंग डिस्टेंस,ट्रैक्शन प्रणाली,ऑसिलेशन,सुरक्षा मानकों तथा परिचालन स्थिरता की विस्तृत जाँच की गई।किसी भी नई रेल तकनीक को नियमित संचालन में शामिल करने से पहले ऐसे परीक्षण अनिवार्य होते हैं ताकि यात्रियों की सुरक्षा और परिचालन की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।इन परीक्षणों की सफलता भारतीय इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की तकनीकी दक्षता का भी परिचायक है।

भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन का निर्माण चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्टरी में किया गया है, जबकि हरियाणा के जींद में हाइड्रोजन उत्पादन तथा री-फ्यूलिंग की आधारभूत संरचना विकसित की गई है।यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल उन्नत तकनीकों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उनका स्वदेशी निर्माता बनने की दिशा में भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा इस परियोजना में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती है।हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे बड़ी विशेषता इसका पर्यावरण-अनुकूल होना है।इसमें पारंपरिक डीज़ल इंजन नहीं होता।

फ्यूल-सेल में हाइड्रोजन और वातावरण की ऑक्सीजन के बीच होने वाली रासायनिक अभिक्रिया से विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिससे ट्रैक्शन मोटर संचालित होती है।इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड,धुआँ अथवा अन्य प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन नहीं होता। उप-उत्पाद के रूप में केवल जलवाष्प निकलती है।यही कारण है कि हाइड्रोजन ट्रेन को भविष्य के सबसे स्वच्छ सार्वजनिक परिवहन साधनों में शामिल किया जा रहा है।

यदि हाइड्रोजन का उत्पादन सौर, पवन अथवा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से किया जाए तो उसे ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ कहा जाता है। भारत सरकार का राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन इसी सोच का परिणाम है।भारतीय रेल में हाइड्रोजन तकनीक का प्रयोग इस मिशन को व्यवहारिक आधार प्रदान करता है और देश को स्वच्छ ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकता है।विश्व स्तर पर अभी बहुत कम देशों ने हाइड्रोजन आधारित रेल तकनीक को व्यावहारिक रूप से अपनाया है।

जर्मनी ने इस क्षेत्र में अग्रणी पहल की,जबकि जापान, चीन, फ्रांस और इटली सहित कुछ अन्य देश भी इस तकनीक के विकास एवं परीक्षण पर कार्य कर रहे हैं।ऐसे देशों की श्रेणी में भारत का शामिल होना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं,बल्कि वैश्विक हरित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उसकी बढ़ती क्षमता का भी प्रमाण है।यदि यह परियोजना सफलतापूर्वक व्यावसायिक संचालन तक पहुँचती है,तो भारत एशिया में हाइड्रोजन रेल तकनीक का अग्रणी देश बनने की दिशा में महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर सकता है।

आर्थिक दृष्टि से भी यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है।भारत प्रतिवर्ष कच्चे तेल एवं पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर भारी विदेशी मुद्रा व्यय करता है। डीज़ल आधारित रेल संचालन में कमी आने से ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होगी और आयात बिल पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।इसके साथ ही इलेक्ट्रोलाइज़र,फ्यूल- सेल,उच्च-दाब हाइड्रोजन टैंक, विशेष वाल्व,पाइपलाइन तथा अन्य अत्याधुनिक उपकरणों के स्वदेशी निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा। इससे उच्च तकनीकी विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार होगा और प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।

हालाँकि इस उपलब्धि का मूल्यांकन केवल उत्साह के आधार पर नहीं,बल्कि यथार्थ की कसौटी पर भी किया जाना चाहिए।वर्तमान में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन अपेक्षाकृत महँगा है।इसके सुरक्षित उत्पादन, संपीड़न,भंडारण और परिवहन के लिए अत्याधुनिक अवसंरचना की आवश्यकता होती है।फ्यूल-सेल प्रणाली की लागत भी अभी पारंपरिक डीज़ल तकनीक की तुलना में अधिक है।प्रशिक्षित तकनीकी मानव संसाधन, विशेष रखरखाव प्रणाली और देशभर में री-फ्यूलिंग स्टेशनों का सुदृढ़ नेटवर्क विकसित करना भी इस परियोजना की सफलता के लिए अनिवार्य होगा।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि हाइड्रोजन वास्तव में कितनी ‘हरित’ होगी।यदि उसका उत्पादन कोयला अथवा प्राकृतिक गैस आधारित प्रक्रियाओं से किया जाएगा, तो पर्यावरणीय लाभ सीमित रह जाएंगे।वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी,जब ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन सौर, पवन,जल अथवा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से बड़े पैमाने पर और प्रतिस्पर्धी लागत पर होने लगे। इसलिए हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना की सफलता राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन की प्रगति से भी सीधे जुड़ी हुई है।

इतिहास बताता है कि प्रत्येक नई तकनीक प्रारम्भ में महँगी और सीमित होती है।सौर ऊर्जा,एलईडी प्रकाश व्यवस्था,मोबाइल संचार और इलेक्ट्रिक वाहन भी कभी अत्यधिक महँगे माने जाते थे,किंतु अनुसंधान,नवाचार और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण उनकी लागत में उल्लेखनीय कमी आई। यही संभावना हाइड्रोजन तकनीक के साथ भी दिखाई देती है।यदि भारत अनुसंधान,स्वदेशी विनिर्माण और अवसंरचना विकास में निरंतर निवेश करता रहा,तो आने वाले वर्षों में इसकी लागत भी व्यवहारिक स्तर तक लाई जा सकेगी।

भारतीय रेल का लक्ष्य केवल नई ट्रेन चलाना नहीं,बल्कि भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप सुरक्षित,स्वच्छ,ऊर्जा-कुशल और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था विकसित करना है।वंदे भारत,अमृत भारत, ‘कवच’,समर्पित माल गलियारे, स्टेशन पुनर्विकास और व्यापक विद्युतीकरण जैसे परिवर्तन उसी दीर्घकालिक दृष्टि का हिस्सा हैं। हाइड्रोजन ट्रेन इस परिवर्तन की अगली महत्वपूर्ण कड़ी है,जो यह दर्शाती है कि भारतीय रेल आने वाले दशकों की चुनौतियों को ध्यान में रखकर अपनी विकास रणनीति तैयार कर रही है।

दिल्ली–जींद रेलखंड पर सफल परीक्षण केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास का भी प्रतीक है जिसके बल पर भारत अंतरिक्ष,डिजिटल भुगतान,वैक्सीन निर्माण,रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर,कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में वैश्विक पहचान बना रहा है।हाइड्रोजन रेल तकनीक उसी परिवर्तनकारी यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

यह भारत की वैज्ञानिक क्षमता, इंजीनियरिंग कौशल और स्वदेशी अनुसंधान की बढ़ती शक्ति को भी रेखांकित करती है।देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन की शुभारम्भ भारतीय रेल के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण होगा।यह संदेश केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए होगा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं तथा भारत भविष्य की स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में नेतृत्व करने की क्षमता रखता है।

नियमित व्यावसायिक संचालन से पहले अभी कुछ तकनीकी परीक्षण, सुरक्षा स्वीकृतियाँ और परिचालन संबंधी औपचारिकताएँ पूरी होनी शेष हैं।इसलिए उत्साह के साथ धैर्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी आवश्यक है।किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि दिल्ली–जींद रेलखंड पर हुए सफल परीक्षण ने यह विश्वास मजबूत कर दिया है कि भारत हरित रेल क्रांति की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है।

हाइड्रोजन ट्रेन केवल पटरियों पर दौड़ने वाली एक नई रेल नहीं होगी, बल्कि विकसित भारत की उस नई सोच का सशक्त प्रतीक बनेगी जिसमें विकास और पर्यावरण परस्पर विरोधी नहीं,बल्कि एक- दूसरे के पूरक हैं।यदि अगले सप्ताह इसका प्रस्तावित शुभारंभ होता है, तो भारतीय रेल एक ऐसे नए युग में प्रवेश करेगी जहाँ स्वदेशी तकनीक, हरित ऊर्जा और आत्मनिर्भरता विकास की नई गति निर्धारित करेंगे।

विज्ञान,नवाचार और सतत विकास के समन्वय से भारतीय रेल विश्व के सबसे आधुनिक,सबसे हरित और सबसे विश्वसनीय रेल नेटवर्कों में अग्रणी बनने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ा चुकी है।यही इस ऐतिहासिक ट्रायल का सबसे बड़ा संदेश,सबसे बड़ी उपलब्धि और विकसित भारत के उज्ज्वल भविष्य का सबसे सशक्त व शुभ संकेत है।

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